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दर्द मिन्नत-कश-ए-दवा न हुआ

Sunday, 24 December 2017

साहित्य - मिर्ज़ा ग़ालिब


दर्द मिन्नत-कश-ए-दवा न हुआ ।
मैं न अच्छा हुआ, बुरा न हुआ ॥

जमा करते हो क्यों रक़ीबों को? ।
इक तमाशा हुआ गिला न हुआ ॥१॥

हम कहां क़िस्मत आज़माने जाएं? ।
तू ही जब ख़ंजर-आज़मा न हुआ ॥२॥

कितने शीरीं हैं तेरे लब! कि रक़ीब ।
गालियां खाके बे-मज़ा न हुआ ॥३॥

है ख़बर गर्म उनके आने की ।
आज ही घर में बोरिया न हुआ ॥४॥

क्या वो नमरूद की ख़ुदाई थी ।
बंदगी में मेरा भला न हुआ ॥५॥

जान दी, दी हुई उसी की थी ।
हक़ तो यूं है, कि हक़ अदा न हुआ ॥६॥

ज़ख़्म गर दब गया, लहू न थमा ।
काम गर रुक गया रवां न हुआ ॥७॥

रहज़नी है कि दिल-सितानी है? ।
लेके दिल दिलसितां रवाना हुआ ॥८॥

कुछ तो पढ़िये कि लोग कहते हैं ।
आज ‘ग़ालिब’ ग़ज़ल-सरा न हुआ ॥९॥


मिन्नत=favour, kindness
मिन्नत-कश-ए-दवा=Obliged To Medicine
रक़ीब=rival, competitor, enemy, opponent
शीरीं=sweet, मीठा
बोरिया=matresses
रवां =right, admissible, lawful, current
रहज़नी=robbery
दिल-सितानी=fascinating, alluring
दिल-सिताँ=stealer of one's heart, lover
ग़ज़ल-सरा=one who reads or recites Gazals

Audio Link : Muhammad Rafi
Analysis here

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वह जो हम में तुम में क़रार था

Monday, 22 February 2016

साहित्य - मोमिन ख़ान मोमिन
संगीत, गायन - मधूरानी फ़ैज़ाबादी

वह जो हम में तुम में क़रार था तुम्हें याद हो के ना याद हो ।
वही यानी वादा-निबाह का तुम्हें याद हो के ना याद हो ॥

वह जो लुत्फ़ मुझ पे थे पेश्तर, वह क़रम के था मेरे हाल पर ।
मुझे सब है याद ज़रा ज़रा तुम्हें याद हो के ना याद हो ॥१॥

वह नए गिले वह शिक़ायतें वह मज़े मज़े की हिकायतें ।
वह हर एक बात पे रूठना तुम्हें याद हो के ना याद हो ॥२॥

कहीं बैठे सब हैं जो रू-बा-रू, तो इशारतों ही में गुफ्तगू ।
वह बयान शौक़ का बरमला तुम्हें याद हो की ना याद हो ॥३॥

हुए इत्तेफ़ाक से गर बहम, वह वफ़ा जताने को दम-बा-दम ।
गिला-ए-मलामत-ए-अक्र्बा तुम्हें याद हो के ना याद हो ॥४॥

कोई बात ऐसी अगर हुई जो तुम्हारे जी को बुरी लगी ।
तो बयान से पहले ही भूलना तुम्हें याद हो के ना याद हो ॥५॥

कभी हम में तुम में भी चाह थी कभी हम से तुम से भी राह थी ।
कभी हम भी तुम भी थे आशना तुम्हें याद हो के ना याद हो ॥६॥

सुनो ज़िक्र है कई साल का के किया एक आप ने वादा था ।
सो निभाने का तो ज़िक्र क्या तुम्हें याद हो के ना याद हो ॥७॥

कहा मैंने वह बात कोठी की मेरे दिल से साफ़ उतर गई ।
तो कहा के जान-ए-मेरी बला तुम्हें याद हो के ना याद हो ॥८॥

वह बिगड़ना वस्ल की राल का वह ना मानना किस्सी बात का ।
वह नहीं नही की हर आन अदा तुम्हें याद हो के ना याद हो ॥९॥

जिसे आप गिनते थे आशना जिसे आप कहते थे बा-वफ़ा ।
मैं वही हूँ मोमिन-ए-मुब्तला तुम्हें याद हो के ना याद हो ॥१०॥


क़रार=Quietude
यानी=Namely, That Is To Say
वादा-निबाह=Loyalty to Promises
लुत्फ़=Favor, Grace
पेश-तर=Before, prior
क़रम=Benevolence, Kindness
गिला=Lamentation
शिक़ायत=Complaint, Accusation
हिकायत=Anecdote
रू-बा-रू=Face To Face
इशारत=love-glances, ogling
गुफ्तगू=Conversation
बरमला=Publicly, in the open
इत्तेफ़ाक=Accident, Chance
बहम=Gather, Together
दम-बा-दम=Every breath, Continuously
मलामत=Rebuke
अकरब=near and dear, loved ones
गिला-ए-मलामत-ए-अक्र्बा=Rebukes to a loved one
राह=Peace, satisfaction
आशना=Acquaintance
ज़िक्र=Mention
कोठी=Mansion, Residence
बला=Calamity, Distress
वस्ल=Meeting, Union
आन=Moment
मुब्तला=Embroiled In, Confused

Madhurani Faizabadi performs :

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नींद से आँख खुली है

Monday, 17 August 2015

साहित्य - शाहिद कबीर
संगीत - जगजीत सिंघ
गायन - चित्रा सिंघ


नींद से आँख खुली है अभी देखा क्या है |
देख लेना अभी कुछ देर में दुनिया क्या है ॥

बाँध रखा है किसी सोच ने घर से हम को |
वर्ना अपना दर-ओ-दीवार से रिश्ता क्या है ॥१॥

रेत की, ईंट की, पत्थर की हो, या मिट्टी की |
किसी दीवार के साये का भरोसा क्या है ॥२॥

घेर कर मुझ को भी लटका दिया मस्लूब के साथ
मैं ने लोगों से यह पूछा था कि क़िस्सा क्या है ॥३॥

संग-रेज़ों के सिवा कुछ तिरे दामन में नहीं
क्या समझ कर तू लपकता है उठाता क्या है ॥४॥

अपनी दानिस्त में समझे कोई दुनिया ‘शाहिद’ |
वर्ना हाथों में लकीरों के अलावा क्या है ॥५॥


मस्लूब=Crucified Person
संग-रेज़ो=Pebbles
तिरे दामन - Your cloak
दानिस्त=Knowledge

Chitra Singh performs :

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एक ही बात ज़माने की किताबों में नहीं

Wednesday, 5 August 2015

साहित्य - सुदर्शन फ़ाकिर
संगीत - ताज अहमद ख़ान
गायन - महमद रफ़ी


एक ही बात ज़माने की किताबों में नहीं |
जो ग़म-ए-दोस्त में नशा है, शराबों में नहीं ॥

हुस्न की भीख ना मांगेंगे, ना जल्वों की कभी |
हम फ़क़ीरों से मिलो खुल के, हिजाबों में नहीं ॥१॥

हर जगह बीते हैं आवारा ख़यालों की तरह |
ये अलग बात है हम आपके ख़्वाबों में नहीं ॥२॥

ना डूबो साग़र-ओ-मीना में यह ग़म, एै ‘फ़ाकिर’ |
के मक़ाम इनका दिलों में हैं, शराबों में नहीं ॥३॥


साग़र-ओ-मीना=Cup and Goblet/Decanter (of wine)

Mohammad Rafi performs :

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तुम आये हो ना शब-ए-इंतज़ार गुज़री है

Monday, 3 August 2015

साहित्य - फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

रात यूँ दिल में तेरी खोयी हुयी याद आयी,
जैसे वीराने में चुपके से बहार आ जाये,
जैसे सहरा में हौले से चले बादल सी,
जैसे बीमार को बेबजह क़रार आ जाये

तुम आये हो, ना शब-ए-इंतज़ार गुज़री है |
तलाश में है सहर, बार बार गुज़री है ॥

जुनूँ में जितनी भी गुज़री, ब-कार गुज़री है |
अगरचे दिल पे ख़राबी हज़ार गुज़री है ॥१॥

हुयी है हज़रत-ए-नासेह से गुफ़्तगू जिस शब |
वह शब ज़रूर सर-ए-कू-ए-यार गुज़री है ॥२॥

वह बात सारे फ़साने में जिसका ज़िक्र ना था |
वह बात उनको बहुत ना-गवार गुज़री है ॥३॥

ना गुल खिले हैं, ना उनसे मिले, ना मय पी है |
अजीब रंग में अब के बहार गुज़री है ॥४॥

चमन पे ग़ारत-ए-गुल-चीं से जाने क्या गुज़री है |
क़फ़स से आज सबा बे-क़रार गुज़री है ॥५॥


ब-कार=useful, well spent
अगरचे=although
नासेह = Advisor, Preacher
कू-ए-यार=Beloved's home/street
सर-ए-कू-ए-यार=Towards/at the beloved's home
ग़ारत=pillage, plunder
गुल-चीं=flower picker
ग़ारत-ए-गुल-चीं=destruction by the flower picker
क़फ़स=Cage
बे-क़रार=uneasy,restless

Dr. Radhika Chopra performs (YouTube)

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खुली जो आँख तो वो था

Saturday, 8 February 2014

साहित्य - फ़रहात शहज़ाद
गायन - मेहदी हसन


खुली जो आँख तो वह था न वह ज़माना था ।
दहकती आग थी, तन्हाई थी, फ़साना था ॥

ग़मों ने बाँट लिया मुझे यूँ आपस में ।
के जैसे मैं कोई लूटा हुआ ख़ज़ाना था ॥१॥

यह क्या के चंद ही क़दमों पे थक के बैठ गये ।
तुम्हें तो साथ मेरा दूर तक निभाना था ॥२॥

मुझे जो मेरे लहू में डुबो के गुज़रा है ।
वह कोई ग़ैर नहीं यार एक पुराना था ॥३॥

खुद अपने हाथ से 'शह्ज़ाद' उस को काट दिया ।
के जिस दरख़्त के टहनी पे आशियाना था ॥४॥

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आपकी याद आती रही

Thursday, 30 January 2014

साहित्य - मक़दूम मोहिउद्दीन
संगीत - जयदेव
चित्रपट-गमन
गायन - छाया गांगुली


आपकी याद आती रही रात भर ।
चश्म-ए-नम मुस्कुराती रही रात भर ॥

रात भर दर्द की शम्मा जलती रही ।
ग़म की लौ थरथराती रही रात भर ॥१॥

बांसुरी की सुरीली सुहानी सदा ।
याद बन बनके आती रही रात भर ॥२॥

याद की चाँद दिल में उतरती रही ।
चाँदनी जगमगाती रही रात भर ॥३॥

कोई दीवाना गलियों में फिरता रहा ।
कोई आवाज़ आती रही रात भर ॥४॥


Chhaya Ganguly performs :

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दिल में इक लहर सी उठी है अभी

Thursday, 14 November 2013

साहित्य - नासिर क़ाज़मी


दिल में इक लहर सी उठी है अभी ।
कोई ताज़ा हवा चली है अभी ॥

शोर बरपा है ख़ाना-ए-दिल में ।
कोयी दीवार सी गिरी है अभी ॥१॥

कुछ तो नाज़ुक़ मिज़ाज हैं हम भी ।
और यह चोट भी नयी है अभी ॥२॥

भरी दुनिया में जी नहीं लगता ।
जाने किस चीज़ की कमी है अभी ॥३॥

तू शरीक़-ए-सुखन नहीं है तो क्या ।
हम-सुखन तेरी खामोशी है अभी ॥४॥

याद के बे-निशाँ जज़ीरों से ।
तेरी आवाज़ आ रही है अभी ॥५॥

शहर की बे-चिराग़ गलियों में ।
ज़िन्दग़ी तुझको ढूँढती है अभी ॥६॥

सो गये लोग उस हवेली के ।
एक खिड़की मगर खुली है अभी ॥७॥

वक़्त अच्छा भी आएगा 'नासिर' ।
ग़म न कर ज़िन्दग़ी पड़ी है अभी ॥८॥



Audio Links : Ghulam Ali, Ghulam Ali

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आह को चाहिए इक उम्र असर होने तक

Saturday, 5 October 2013

साहित्य - मिर्ज़ा ग़ालिब


आह को चाहिए एक उम्र असर होने तक ।
कौन जीता है तेरी ज़ुल्फ़ के सर होने तक ॥

दाम हर मौज मे है, हल्क़ा-ए-सद-काम-ए-नहंग ।
देखें क्या गुज़रे है क़तरे पे गौहर होने तक ॥१॥

आशिक़ी सब्र-तलब और तमन्ना बेताब ।
दिल का क्या रंग करूँ ख़ून-ए-जिगर होने तक ॥२॥

हम ने माना कि तग़ाफ़ुल ना करोगे लेकिन ।
ख़ाक हो जाएँगे हम तुम को ख़बर होने तक ॥३॥

परतव-ए-ख़ुर से है शबनम को फ़ना की तालीम ।
मैं भी हूँ एक इनायत की नज़र होने तक ॥४॥

यक नज़र बेश नहीं फ़ुर्सत-ए-हस्ती, ग़ाफ़िल ।
गर्मी-ए-बज़्म है एक रक़्स-ए-शरर होने तक ॥५॥

ग़म-ए-हस्ती का ‘असद’ किस से हो जुज़ मर्ग इलाज ।
शमा हर रंग में जलती है सहर होने तक ॥६॥


सर होना = conquer, tame
ज़ुल्फ़ के सर होना = tame the curls of hair
दाम [Prk. दामं; S. दाम (base दामन्), rt. दा 'to bind'], = A rope, cord, string; a fetter... here, a net
दाम हर मौज मे = A net in every wave
नहंग = a crocodile,a water dragon or other similar monster
काम-ए-नहंग = action of crocodile
हल्क़ा-ए-सद = hundred chains
हल्क़ा-ए-सद-काम-ए-नहंग = hundred lines of crocodiles/monsters in vile action
गौहर = pearl
सब्र-तलब = needing/demanding patience
ख़ून-ए-जिगर = devastation with pain
तग़ाफ़ुल = ignore
खुर - sun
परतव - rays
परतव-ए-ख़ुर - sun rays
शबनम - dew
फ़ना = self-destruction
इनायत की नज़र = merciful glance
बेश = lot, too much
फ़ुर्सत-ए-हस्ती = Duration Of Life
ग़ाफ़िल = negligent (here, addressing the muse)
गर्मी-ए-बज़्म = Warmth of the gathering/party
रक़्स-ए-शरर = Dance of the spark
ग़म-ए-हस्ती = sorrows of life
जुज़ = besides, except, other than
मर्ग = death
शमा = candle
सहर = Dawn/Morning

Audio Links : Ghulam Ali, Jagjit Singh, Jagjit Singh, Ustad Barkat Ali Khan
Analysis here

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हम ने एक शाम चिराग़ों से सजा रखी है

Tuesday, 17 September 2013

साहित्य - ताहिर फ़राज़
संकलन - काश
गायन - हरिहरन


हम ने एक शाम चिराग़ों से सजा रखी है ।
शर्त लोगों ने हवाओँ से लगा सखी है ॥

हम भी अंजाम की परवाह नही करते यारो ।
जान हम ने भी हथेली पे उठा रखी है ॥१॥

शायद आ जाये कोई हम से ज़्यादा प्यासा ।
बस यही सोचके थोड़ी बचा सखी है ॥२॥

तुम हमें क़त्ल तो करने नहीं आये लेकिन ।
आस्तीनों में यह क्या चीज़ छुपा सखी है ॥३॥

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काश ऐसा कोई मंज़र होता

साहित्य - ताहिर फ़राज़
संकलन - काश
गायन - हरिहरन


काश ऐसा कोई मंज़र होता ।
मेरे कांधे पे तेरा सिर होता ॥

जमा करता जो में आये हुए संग ।
सिर छुपाने के लिये घर होता ॥१॥

इस बुलंदी पे बहुत तन्हा हूँ ।
काश मैं सब के बराबर होता ॥२॥

उसने उलझादिया दुनिया में मुझे ।
वरना एक और क़लंदर होता ॥३॥

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बीते हुए लम्हों की कसक साथ तो होगी

Saturday, 5 January 2013

साहित्य - हसन कमाल
संगीत - रवि
चित्रपट-निकाह


अभी अलविदा मत कहो दोस्तों
न जाने फिर कहाँ मुलाक़ात हो
क्योंकि ...

बीते हुए लम्हों की कसक साथ तो होगी ।
ख़्वाबों में ही हो चाहे मुलाक़ात तो होगी ॥

यह प्यार मे डूबी हुयी रँगीन फ़ज़ायें ।
यह चहरें यह नज़रें यह जवाँ रुत यह हवायें ।
हम जाये कहीं इनकी महक साथ तो होगी ॥१॥

फूलों की तरह दिल में बसाये हुए रखना ।
यादों के चिराग़ों को जलाये हुए रखना ।
लम्बा है सफ़र इस में कहीं रात तो होगी ॥२॥

यह साथ गुज़ारे हुए लम्हात की दौलत ।
जज़्बात की दौलत यह ख़यालात की दौलत ।
कुछ पास न हो पास यह सौग़ात तो होगी ॥३॥

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दिल के अरमाँ आँसुओं में बह गये

साहित्य - हसन कमाल
संगीत - रवि
चित्रपट - निकाह
गायन - सल्मा अाघा


दिल के अरमाँ आँसुओं में बह गये ।
हम वफ़ा करके भी तनहा रह गये ॥

ज़िंदगी एक प्यास बनकर रह गयी ।
प्यार के क़िस्से अधूरे रह गये ॥१॥

शायद उनका आख़्ररी हो यह सितम ।
हर सितम यह सोचकर हम सह गये ॥२॥

ख़ुद को भी हमने मिटा डाला मगर ।
फ़ासले जो दरमियाँ थे रह गये ॥३॥

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हजारों ख्वाहिशें ऐसी

Thursday, 4 October 2012

साहित्य - मिर्ज़ा ग़ालिब


हज़ारों ख़्वाहिशें ऐसी कि हर ख़्वाहिश पे दम निकले ।
बहुत निकले मेरे अरमाँ, लेकिन फिर भी कम निकले ॥

डरे क्यूं मेरा क़ातिल क्या रहेगा उस की गर्दन पर ।
वह ख़ून जो चश्म-ए-तर से उम्र भर यूँ दम-ब-दम निकले ॥१॥

निकलना ख़ुल्द से आदम का सुनते आये हैं लेकिन ।
बहुत बे-आबरू हो कर तिरे कूचे से हम निकले ॥२॥

भरम खुल जाये ज़ालिम तेरे क़ामत की दराज़ी का ।
अगर उस तुर्रा-ए-पुरपेच-ओ-ख़म का पेच-ओ-ख़म निकले ॥३॥

मगर लिखवाये कोई उस को ख़त तो हम से लिखवाये ।
हुई सुबह और घर से कान पर रख कर क़लम निकले ॥४॥

हुई इस दौर में मनसूब मुझ से बादा-आशामी ।
फिर आया वह ज़माना जो जहाँ में जाम-ए-जम निकले ॥५॥

हुई जिन से तवक़्क़ू ख़स्तगी की दाद पाने की ।
वह हम से भी ज़्यादा ख़सता-ए-तेग़-ए-सितम निकले ॥६॥

मुहब्बत में नहीं है फ़र्क़ जीने और मरने का ।
उसी को देख कर जीते हैं जिस काफ़िर पे दम निकले ॥७॥

(apocryphal verse)
ज़रा कर ज़ोर सीने पर कि तीर-ए-पुरसितम निकले ।
जो वह निकले तो दिल निकले जो दिल निकले तो दम निकले ॥८॥

(apocryphal verse)
ख़ुदा के वास्ते पर्दा ना क़ाबे से उठा ज़ालिम ।
कहीं ऐसा न हो याँ भी वही काफ़िर सनम निकले ॥९॥

कहां मयख़ाने का दरवाज़ा 'ग़ालिब' और कहां वाइज़ ।
पर इतना जानते हैं कल वह जाता था कि हम निकले ॥१०॥


चश्म-ऐ-तर=गीली आँखें
खुल्द=जन्नत
कूचे=गली
क़ामत=stature
दराजी=लंबाई
तुर्रा=पगड़ी मे पहननेवाले तुराई
पेच-ओ-ख़म=curls in the hair
मनसूब=association
बादा-आशामी=पीने से संबंधित
तव्वको=उम्मीद
खस्तगी=घाव
खस्ता=टूटा हुआ/घायल/मरीज़
तेग=तलवार

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शाम-ए-ग़म जब बिखर गयी होगी

Tuesday, 27 September 2011

साहित्य - मोहसिन नक़्वी
गायन - ग़ुलाम अली


शाम-ए-ग़म जब बिखर गयी होगी ।
जाने किस किस के घर गयी होगी ॥

इतनी लरज़ाँ न थी चराग़ की लौ ।
अपने साये से डर गई होगी ॥१॥

चांदनी एक शब की मेहमान थी ।
सुबह होते ही मर गयी होगी ॥२॥

देर तक वह ख़फ़ा रहे मुझ से ।
दूर तक ये ख़बर गयी होगी ॥३॥

एक दरिया का रुख़ बदलते ही ।
एक नदी फिर उतर गयी होगी ॥४॥

जिस तरफ़ वो सफ़र पे निकला था ।
सारी रौनक उधर गई होगी ॥५॥

रात सूरज को ढूँढने के लिए ।
ता-बा- हद-ए-सेहर गयी होगी ॥६॥

मेरी यादों की धुप छाओं में ।
उस की सूरत निखर गयी होगी ॥७॥

याँ तालुक न निभ सका उस से ।
याँ तबियत ही भर गयी होगी ॥८॥

तेरी पल भर की दोस्ती ।
उस को बदनाम कर गयी होगी ॥९॥


लरज़ाँ = quiver

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ये क्या जगह है दोस्तों

Tuesday, 5 July 2011

साहित्य - शह्र्यार
चित्रपट-उम्राओ जाँ
संगीत - ख़य्याम
गायन - आशा भोंसले


यह क्या जगह है दोस्तों, यह कौन सा दयार है ।
हद-ए-निगाह तक जहां, ग़ुबार ही ग़ुबार है ॥

ये किस मुक़ाम पर हयात मुझको लेके आ गई ।
ना बस खुशी पे है जहां, ना ग़म पे इख्तियार है ॥१॥

तमाम उम्र का हिसाब मांगती है ज़िन्दगी ।
ये मेरा दिल कहे तो क्या, के खुद से शर्मसार है ॥२॥

बुला रहा है कौन मुझको चिलमनों के उस तरफ़ ।
मेरे लिये भी क्या कोई उदास बेक़रार है ॥३॥

न जिसकी शक़ल है कोई, न जिसका नाम है कोई ।
एक ऐसी शै का क्यों हमें अज़ल से इन्तज़ार है ॥४॥

दयार=region/boundary
हद-ए-निगाह=limits of sight
ग़ुबार=dust-storm
मुक़ाम=situation, milestone
हयात=life
इख्तियार=power, control
शर्मसार=shameful
चिलमन=blinds/curtains made of reed
बेक़रार=anxious
शै=चीज़, Object
अज़ल=beginning of creation

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पत्ता-पत्ता बूटा-बूटा

Monday, 7 February 2011

साहित्य - मीर तक़ी 'मीर'


पत्ता-पत्ता बूटा-बूटा हाल हमारा जाने है ।
जाने न जाने गुल ही न जाने बाग़ तो सारा जाने है॥

लगने न दे बस हो तो उस के गौहर-इ-गोश को बाले तक ।
उस को फलक चश्म-ए-माह-ओ-खुर के पुतली का तारा जाने है ॥१॥

आगे उस मुताकब्बिर के हम खुदा खुदा किया करते हैं ।
कब मौजूद खुदा को वो मघरूर खुद-आरा जाने है ॥२॥

आशिक़ सा तो सादा कोई और न होगा दुनिया में ।
जी के ज़ान को इश्क में उस के अपना वारा जाने है ॥३॥

चारागरी बीमारी-ए-दिल की रस्म-ए-शहर-ए-हुस्न नहीं ।
वरना दिलबर-ए-नादाँ भी इस दर्द का चारा जाने है ॥४॥

क्या ही शिकार-फरेबी पर मघरूर है वो सय्याद बच्चा ।
तैर उड़ते हवा मैं सारे अपनी उस्सारा जाने है ॥५॥

मेहर-ओ-वफ़ा-ओ-लुत्फ़-ओ-इनायत एक से वाक़िफ इनमें नहीं ।
और तो सब कुछ तंज़-ओ-किनाया रम्ज़-ओ-इशारा जाने है ॥६॥

क्या क्या फ़ितने सर पर उसके लाता है माशूक़ अपना ।
जिस बेदिल बेताब-ओ-तवां को इश्क़ का मारा जाने है ॥७॥

आशिक़ तो मुर्दा ही हमेशा जी उठाता है देखे उसे ।
यार के आ जाने को यक़ायक़ उम्र दोबारा जाने है ॥८॥

रखानों से दीवार-ए-चमन के मूंह को ले हैछिपा यानी ।
उन सुराखों के टुक रहने को सौ का नज़ारा जाने है ॥९॥

तशना-ए-खून है अपना किअना 'मीर' भी नादाँ तल्खी-कश ।
दम-दार आब-ए-तेघ को उस के आब-ए-गंवारा जाने है ॥१0॥

पत्ता=Leaf
बूटा=Undershrub
गुल=Rose
बाग़=Garden
गौहर-ए-गोश=Pearl like ears
बाले=Earrings
फलक=Sky, Heaven, Fortune, Fate
चश्म-ए-माह-ओ-खुर=Eye of the Moon and the Sun
पुतली-का-तारा=Apple of the eye
मुतकब्बिर=Proud, haughty, arrogant, disdainful
मघरूर=Arrogant, Braggart, Lofty, Proud
खुद-आरा=Self Adorer
जी=Life, Existence
ज़ान=Loss
वार=Assault, अपना वारा=Self sacrifice
चारागरी=Healing Of Wounds and Pain
शहर-ए-हुस्न=Beautiful city/surroundings
चारा=Aid, Cure, Help, Means, Redress, Resource, Remedy
सय्याद=Hunter
तैर=Flying, a winged creature
उस्सार=A Lot, Extremely, Endless, Boundless
मेहर=Kindness, Mercy
इनायत=Blessing, Favour, Kindness
तंज़=Jest, Irony, Laugh, Quirk, Sarcasm,Satire, Wisecrack, Witticism
किनाया=Allusion; metaphor, trope, figure, metonymy; expression; innuendo; sarcasm, taunt, jeer, banter;
तंज़-ओ-किनाया=Taunting, teasing
रम्ज़=Allegory, Secret, Mysterious , रम्ज़-ओ-इशारा=Hinting at
फितना=Sedition, Mischief, Mutiny, Quarrel, Revolt, Temptation, Wickedness
तवां=Thy, thine
रखन=Protecting, guarding
यानी=Namely, That Is To Say, Quasi, Viz
सुर्खी=Lipstick, Redness, Title
टुक=A cadence, A moment
तशना-ए-खून=Thirst for blood
तल्खी=Acidity, Bitterness, Pungency, तल्खी-कश=one who bears/endures bitterness
दम-दार=Holding energy/life, vitality
आब=Water, तेघ=Sword , आब-ए-तेघ=Water/wine that tastes bitter
गंवारा=Agreeable, Palatable आब-ए-गंवारा=Good/Rich wine

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तरुण आहे रात्र अजूनि

Wednesday, 30 June 2010

साहित्य-सुरेश भट
गायन - आशा भोंसले


तरुण आहे रात्र अजूनि, राजसा, निजलास का रे? ।
एवढयातच त्या कुशीवर तू असा वळलास का रे? ॥

अजूनही विझल्या न गगनी तारकांचा दीपमाला ।
अजून मी विझले कुठे रे? हाय, तू विझलास का रे? ॥१॥

सांग, ह्या कोजागिरीच्या चांदण्याला काय सांगू? ।
उमलते अंगांग माझे, आणि तू मिटलास का रे? ॥२॥

बघ तुला पुसतोच आहे पश्चिमेचा गार वारा ।
रातराणीच्या फुलांचा गंध तू लूटलास का रे? ॥३॥

उसळती ह्रदयात माझ्या अमृताचा धुंद लाटा ।
तू किनार्‍या सारखा पण कोरडा उरलास का रे? ॥४॥

ओठ अजूनि बंद का रे? श्वास ही मधुमंद का रे? ।
बोल शेजेच्या फुलावर तू असा रुसलास का रे? ॥५॥

The night is still young; (my) Prince, why did you fall asleep?
Why did you (in your sleep) turn away from me so soon?

The garland of stars in the sky haven't been extinguished yet
Have I been doused yet? Alas, why have you smouldered?

Tell me, what shall I tell this autumn moon? (कोजागिरी=Sharad Poornima)
Here my desires are blooming; why have you withered away?

Look, the cold westerly winds are asking you,
Have you looted all the fragrance away from the Night-blooming Jasmine? (Cestrum nocturnum)

A faint elixir is churning out in my heart's ocean (reference to Samudra Manthan)
Why do you remain frigid like the shore ?

Are your lips still sealed ? Why is your breath faint?
Lying on (this) bed of flowers, tell me why are you cross (with me) ?

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गुलों में रंग भरे बाद-ए-नौबहार चले

Thursday, 3 December 2009

साहित्य - फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
गायन - मेहदी हसन


गुलों में रंग भरे बाद-ए-नौबहार चले |
चले भी आओ के गुलशन का कारोबार चले ॥

क़फ़स उदास है यारो सबा से कुछ तो कहो |
कहीं तो बह्र-ए-ख़ुदा आज ज़िक्र-ए-यार चले ॥१॥

कभी तो सुबह तेरे कुंज-ए-लब से हो आगा़ज़ |
कभी तो शब सर-ए-काकुल से मुश्कबार चले ॥२॥

बड़ा है दर्द का रिश्ता यह दिल ग़रीब सही |
तुम्हारे नाम पे आयेंगे ग़मगु़सार चले ॥३॥

जो हम पे गु़ज़री सो गु़ज़री मगर शब-ए-हिज्रां |
हमारे अश्क तेरि आक़बत संवर चले ॥४॥

हुज़ूर-ए-यार हुई दफ़्तर-ए-जुनूं की तलब |
गिरह में लेके गरेबां के तार तार चले ॥५॥

मक़ाम फ़ैज़ कोई राह में जचा ही नहीं |
जो कू-ए-यार से निकले तो सू-ए-दार चले ॥६॥

बाद-ए-नौबहार=Breeze of new spring
क़फ़स=Cage
सबा=Breeze
कुंज-ए-लब=Sweet Lips
बह्र-ए-ख़ुदा=For God's sake
आगा़ज़=Free
शब=Night
सर-ए-काकुल=Fragrant wavy head (hair)
मुश्कबार=Encompass
ग़मगुसार=Loyal follower
अश्क=tears
आक़बत=Fate/destiny
आक़बत संवर चले=make destiny succeed
मक़ाम=Destination
कू-ए-यार=Corner of the beloved (beloved's place)
सू-ए-दार=Death's platform

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दर्द-ए-दिल दर्द-आशना जाने

Wednesday, 15 July 2009

साहित्य - बहादुर शाह 'ज़फ़र'


दर्द-ए-दिल दर्द-आशना जाने ।
और बेदर्द कॊई क्या जाने ॥

ज़ुल्फ़ तेरी है वह बला काफ़िर ।
पूछ मुझसे तेरी बला जाने ॥१॥

बे-वफ़ा जाने क्या वफ़ा मेरी ।
बा-वफ़ा हो तो वह वफ़ा जाने ॥२॥

कर दिया एक निगाह में बेखुद ।
चश्म-ए-क़ातिल है तो खुदा जाने ॥३॥

सरफ़राज़ी उसी की है जो 'ज़फ़र' ।
आपको सबका ख़ाक-ए-पा जाने ॥४॥

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