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मृगनयना रसिक मोहिनी

Wednesday, 1 February 2017

साहित्य-गोविंद बल्लाळ देवल
संगीत-गोविंद बल्लाळ देवल
स्वर-वसंतराव देशपांडे
राग-दरबारी कानडा
नाटक - संशयकल्लोळ


मृगनयना रसिक मोहिनी ।
कामिनी होती ती मंजूळ मधुरालापिनी ॥

नवयौवनसंपन्‍न रम्य गतिविलासिनी ॥१॥

आह्लादक मुखचंद्रहि होता ।
होती दृष्टि ती प्रेम-रस-वाहिनी ॥२॥

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दरबारी कान्हऱा - समझत ना मन तो मेरो

Wednesday, 20 April 2016

राग - दरबारी कान्हऱा
ताल - द्रुत तीनताल


स्थायी
समझत ना मन तो मेरो,
लाख बार समझावत हूँ मैं,
काहे न कटत अंधेरा ॥

अंतरा
झूठी माया झूठी काया,
झूठा जगत बरेसा,
छत प्रभु एक के राम ॥

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दरबारी कान्हऱा - किन बैरन कान भरे

राग - दरबारी कान्हऱा
ताल - द्रुत तीनताल


स्थायी
किन बैरन कान भरे,
मोरे पिया मो से बोलत नाही ॥

अंतरा
हूँ तो वा की चरनन दासी,
चरनन शीश धरे ॥

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दरबारी कान्हऱा - और नहीं कछु काम के

राग - दरबारी कान्हऱा
ताल - विलंबित एकताल


स्थायी
और नहीं कछु काम के,
भरोसे अपने राम के ॥

अंतरा
जो चाहूँ सो देत पधारत अंत लेत सुख धाम के,
भरोसे अपने राम के ॥

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