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बरखा रात की चांदनी

Monday, 30 December 2019

राग - केदार
ताल - तीनताल


स्थायी
बरखा रात की चांदनी में,
बरसत रस देखो बूँद बूँद॥

अंतरा
बाँसुरी बजावत सब को रिझावत,
गावत सब मिल राग केदार ॥

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कान्हा रे नंदनंदन

राग - केदार
ताल - तीनताल


स्थायी
कान्हा रे नंदनंदन,
परम निरंजन हे दुःख भंजन॥

अंतरा
कंठ बनी मोतियन की माला,
पहिरत मुदित भई ब्रजबाला ॥

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सावन की बूँदनिया

राग - केदार
ताल - एकताल


स्थायी
सावन की बूँदनिया,
बरसत घन घोर॥

अंतरा
बिजली चमकत दमकत,
दास मनवा अति लरजत,
मोर करे शोर ॥

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सिया रघुबर की छबि

राग - केदार
ताल - एकताल


स्थायी
सिया रघुबर की छबि देखी,
राम नाम है प्यास जीवन की॥

अंतरा
प्राण तन में जब लग मेरो,
नैनन में बसी मूरत सिया रघुबर की ॥

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चतुर सुघर बलमा

राग - केदार
ताल - एकताल


स्थायी
चतुर सुघर बलमा तुम,
पकरत हो बैंय्या,
ऐसी नवेली नार कहा माने,
हित की सार गँवार तुम॥

अंतरा
महाज्ञानी अति प्रवीण,
सब विधि जानत हो,
पहचानत हो बलमा तुम,
अपने घर की लार लड़ाई,
लाड़ली को मनाए जात,
प्यार सरस गरवा लगाए ॥

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