गुलों में रंग भरे बाद-ए-नौबहार चले
Thursday, 3 December 2009
साहित्य - फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
गुलों में रंग भरे बाद-ए-नौबहार चले
चले भी आओ के गुलशन का कारोबार चले
क़फ़स उदास है यारो सबा से कुछ तो कहो
कहीं तो बह्र-ए-ख़ुदा आज ज़िक्र-ए-यार चले
कभी तो सुबह तेरे कुंज-ए-लब से हो आगा़ज़
कभी तो शब सर-ए-काकुल से मुश्कबार चले
बड़ा है दर्द का रिश्ता यह दिल ग़रीब सही
तुम्हारे नाम पे आयेंगे ग़मगु़सार चले
जो हम पे गु़ज़री सो गु़ज़री मगर शब-ए-हिज्रां
हमारे अश्क तेरि आक़बत संवर चले
हुज़ूर-ए-यार हुई दफ़्तर-ए-जुनूं की तलब
गिरह में लेके गरेबां के तार तार चले
मक़ाम फ़ैज़ कोई राह में जचा ही नहीं
जो कू-ए-यार से निकले तो सू-ए-दार चले
बाद-ए-नौबहार=Breeze of new spring, क़फ़स=Cage, सबा=Breeze, कुंज-ए-लब=Sweet Lips, बह्र-ए-ख़ुदा=For God's sake, आगा़ज़=Free, शब=Night, सर-ए-काकुल=Fragrant wavy head (hair), मुश्कबार=Encompass,ग़मगुसार=Loyal follower, अश्क=tears, आक़बत=Fate/destiny, आक़बत संवर चले=make destiny succeed, मक़ाम=Destination, कू-ए-यार=Corner of the beloved (beloved's place), सू-ए-दार=Death's platform