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मृगनयना रसिक मोहिनी

Wednesday, 1 February 2017

साहित्य-गोविंद बल्लाळ देवल
संगीत-गोविंद बल्लाळ देवल
स्वर-वसंतराव देशपांडे
राग-दरबारी कानडा
नाटक - संशयकल्लोळ


मृगनयना रसिक मोहिनी ।
कामिनी होती ती मंजूळ मधुरालापिनी ॥

नवयौवनसंपन्‍न रम्य गतिविलासिनी ॥१॥

आह्लादक मुखचंद्रहि होता ।
होती दृष्टि ती प्रेम-रस-वाहिनी ॥२॥

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ಮಾಡಿ ಮಾಡಿ ಕೆಟ್ಟರೋ ಮನವಿಲ್ಲದೆ

Wednesday, 31 August 2016

ಸಾಹಿತ್ಯ-ಬಸವಣ್ಣ


ಮಾಡಿ ಮಾಡಿ ಕೆಟ್ಟರೋ ಮನವಿಲ್ಲದೆ,
ನೀಡಿ ನೀಡಿ ಕೆಟ್ಟರೋ ನಿಜವಿಲ್ಲದೆ ॥

ಮಾಡಿದೆನೆಂಬುದು ಮನದಲಿ ಹೊಳೆದರೆ,
ನೀಡಿದೆನೆಂಬುದು ನಿಜದಲಿ ತಿಳಿದರೆ,
ಛೇಡಿಸಿ ಕಾಡಿತ್ತು ಶಿವನ ಡಂಗುರ ॥೧॥

ಮಾಡಿದೆನೆನ್ನದಿರಾಲಿಂಗಕೆ,
ನೀಡಿದೆನೆನ್ನದಿರಾಜಂಗಮಕೆ,
ಮಾಡುವ ನೀಡುವ ನಿಜಗುಣ ಉಳ್ಳೆಡೆ,
ಕೂಡಿಕೊಂಡಿರ್ಪ ಕೂಡಲಸಂಗಯ್ಯ | ॥೨॥


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ಚಕೋರಂಗೆ ಚಂದ್ರಮನ

ಸಾಹಿತ್ಯ-ಬಸವಣ್ಣ


ಚಕೋರಂಗೆ ಚಂದ್ರಮನ ಬೆಳಗಿನ ಚಿಂತೆ,
ಅಂಬುಜಕೆ ಭಾನುವಿನ ಉದಯದ ಚಿಂತೆ ॥೧॥

ಭ್ರಮರಂಗೆ ಪರಿಮಳದ ಬಂಡುಂಬ ಚಿಂತೆ,
ಎನಗೆ ನಮ್ಮ ಕೂಡಲಸಂಗಮದೇವನ ಚಿಂತೆ ॥೨॥

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यमन - धनिया धन धन देते रोहि

Friday, 17 June 2016

राग - यमन
ताल - द्रुत तीनताल


स्थायी
धनिया धन धन देते रोहि,
शूल सुलभ नाहि ॥

अंतरा
धन धन बाको नैन में रबसे,
लाजर प्रीता साँवरिया ने,
जाने अंतर देते रोहि,
शूल सुलभ नाहि ॥

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शिवमत भैरव - तोरी बारी फूल

Thursday, 2 June 2016

राग - शिवमत भैरव
ताल - द्रुत तीनताल


स्थायी
तोरी बारी फूल रही,
बरन बरन के फूलवा ॥

अंतरा
हूँ बल जाऊँ,
मोरे अंगना ॥

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बिहाग - सब सखियाँ चलो प्रभू के दरशन

Wednesday, 20 April 2016

राग - बिहाग
ताल - द्रुत तीनताल


स्थायी
सब सखियाँ चलो प्रभू के दरशन,
धन धन भाग सुफल होत नयन ॥

अंतरा
सोला सिंगर सजो अत सुलझन,
कुसुम सुगंधित हररंग सुभ क्षण,
गिरिधर प्रभू के चरनन अरपण,
आज करो तन मन धन अरपण ॥

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बिहाग - टेर सुने पिया की आवन की

रचना - नियामत ख़ान 'सदारंग'
राग - बिहाग
ताल - द्रुत तीनताल


स्थायी
टेर सुने पिया की आवन की,
सुध बिसरायी मेरे मन की ॥

अंतरा
जब ही मिलत मोरे आन ‘सदारंग’,
तब ही होत सखी मेरे मन की ॥

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बिहाग - कैसे सुख सोवे

रचना - नियामत ख़ान 'सदारंग'
राग - बिहाग
ताल - विलंबित एकताल


स्थायी
कैसे सुख सोवे नींदरिया,
श्याम सूरत चित चढ़ी ॥

अंतरा
सोय सोय ‘सदारंग’ अकुलाये,
या विधि गाँठ पड़ी ॥

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बिहाग - कवन ढंग तोरा सजनी

राग - बिहाग
ताल - विलंबित एकताल


स्थायी
कवन ढंग तोरा सजनी,
तू तो इतरात उतरात बीती जात ॥

अंतरा
छांड मान उठ ले हो बलैय्याँ,
सोत लगा रही घात ॥

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बागेश्री - कौन करत तोरी बिनत

राग - बागेश्री
ताल - द्रुत तीनताल


स्थायी
कौन करत तोरी बिनत पियरवा,
मानो ना मानो हमरी बात ॥

अंतरा
जब से गयो मोरी सुध-बुध लीनी,
चाहे सौतन के घर जात ॥

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