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भैरव - धन धन मूरत कृष्ण मुरारी

Tuesday, 4 June 2013

रचना - विष्णु नारायण भातखंडे 'हररंग'
राग - भैरव
ताल - द्रुत तीनताल


स्थायी
धन धन मूरत कृष्ण मुरारी
सुलछ्छन गिरिधारी
छबी सुंदर लागे अति प्यारी ॥

अंतरा
बँसीधर मनमोहन सुहावे
बली बली जाऊँ मोरे मन भावे
‘हररंग’ ग्यान बिचारी ॥

लिपिबद्ध स्वर
x 0
पम
मू S
रे S रे S सा S सा ध̣ S ऩी S ऩी सा सा
कृ S ष्ण मु रा S री S सु S छ्छ S गि रि
रे S सा S सा रे नी नी सां S
धा S री S बि सुं S ला S गे S ति
गम नीसां रेंसां नीसां नी मग
प्या S S S S S री S
S S नी नी
बं S सी S
सां सां सां सां नी रे सां S नी सां गं मं रे S सां S
मो सु हा S वे S ली ली जा S ऊँ S
नी धं नी सां धं S S S
मो रे भा S वे S रं ग्या S बि
गम पध नीसां रेंसां नीसां नीध मग
चा S S S S S री S

1 comments:

Anonymous said...

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